हनुमान जयंती – सनातन संस्था

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छोटोंसे बडोंतक सभी को अपना लगनेवाले एक देवता हैं, हनुमान !शक्ति, भक्ति, कला, चातुर्य एवं बुद्धिमत्ता से श्रेष्ठ होने पर भी प्रभु श्रीरामचंद्रों के चरणों में सदैव लीन रहनेवाले हनुमान जी का जन्मका इतिहास एरां उनकी कुछ गुणविशेषताएं इस लेख से समझ लेते है ।

जन्मका इतिहास
राजा दशरथने पुत्रप्राप्ति की कामना से पुत्रकामेष्टी यज्ञ किया । तब यज्ञ से अग्निदेव प्रगट होकर उन्होंने दशरथकी रानियों के लिए पायस(खीर, यज्ञ का अवशिष्ट प्रसाद) प्रदान किया था । दशरथ की रानियों समान तपश्‍चर्या करनेवाली अंजनी को भी पायस प्राप्त हुआ था । जिससे हनुमानजी का जन्म हुआ । उस दिन चैत्रपूर्णिमा था, जो हनुमान जयंती के रूप में मनाई जाती है । वाल्मीकिरामायणमें(किष्किंधाकांड, सर्ग ६६) आगे दिए अनुसार हनुमान जी की जन्मकथा है अंजनी के गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ । जन्म होते ही उन्हें उगता हुआ सूर्य, किसी लाल फल की भांति लगा । इससे बालक हनुमान ने सूर्य को खाने की इच्छा से उनकी ओर आकाश में छलांग लगाई । उस दिन पर्वतिथि होने के कारण सूर्य को निगलने के लिए राहू आया था । सूर्य की ओर बढनेवाला हनुमान दूसरा राहू ही है, यह विचार कर इंद्र ने उनपर वज्र चला दिया । यह वज्र उनकी ठुड्डी पर लगा, जिससे वह टेढी हो गई । तब से उनका नाम हनुमान हो गया ।
कार्य एवं विशेषताएं
१. सर्वशक्तिमान
जन्म लेते ही सूर्य को निगलने के लिए उडान भरने की जो कथा है,उससे यह स्पष्ट होता है कि, वायुपुत्र (वायुतत्त्व से उत्पन्न) हनुमान,सूर्य पर (तेजतत्त्व पर) विजय प्राप्त करने में सक्षम थे । पृथ्वी,आप, तेज, वायु एवं आकाश तत्त्वों में वायुतत्त्व तेजतत्त्व से अधिक सूक्ष्म, अर्थात अधिक शक्तिशाली है ।
१ अ. भूत एवं हनुमान : सर्व देवताओं में केवल हनुमान को ही अनिष्ट शक्तियां कष्ट नहीं दे सकतीं । लंका में लाखों राक्षस थे, तब भी वे हनुमान का कुछ नहीं बिगाड पाए । इसीलिए हनुमान जी को भूतों का स्वामी कहा जाता है । यदि किसी को भूतबाधा हो, तो उस व्यक्ति को हनुमान जी के मंदिर ले जाते हैं अथवा हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं । इससे कष्ट दूर न हो, तो पीडित व्यक्ति पर से नारियल उतारकर, हनुमान जी के मंदिर में जाकर फोडते हैं । नारियल उतारने से व्यक्ति में विद्यमान अनिष्ट शक्ति नारियल में प्रविष्ट होती है । वह नारियल हनुमान जी के मंदिर में फोडने पर उससे बाहर निकलने वाली शक्ति हनुमान जी के सामर्थ्य से नष्ट होती है । तत्पश्‍चात् वह नारियल विसर्जित किया जाता है ।
२. महापराक्रमी : राम-रावण युद्ध में ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से राम,लक्ष्मण, सुग्रीव आदि वीर अचेत हो गए । तब जांबवंत ने हनुमान के पराक्रम का इस प्रकार वर्णन किया – वानरश्रेष्ठ हनुमान जीवित है ना? यह वीर जीवित है, तो संपूर्ण सेना का ही वध क्यों न हो जाए, वह न होने समान ही है। यदि हनुमान प्राणत्याग करते हैं, तो हम जीवित होते हुए भी मृतप्राय ही हैं । हनुमानजी ने जंबु-माली, अक्ष, धूम्राक्ष,निकुंभ आदि बलवान राक्षसों का नाश किया । उन्होंने रावण को भी मूर्च्छित कर डाला । समुद्र-लंघन, लंकादहन, द्रोणागिरि उठाकर लाना इत्यादि घटनाएं हनुमानजी के शौर्य की प्रतीक हैं ।
३. भक्त : दास्यभक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देने हेतु आज भी हनुमान की राम भक्ति का स्मरण होता है । वे अपने प्रभु पर प्राण अर्पण करने हेतु सदैव तैयार रहते । उनकी सेवा की तुलना में शिवत्व एवं ब्रह्मत्व भी उन्हें कौडी के मोल लगते । हनुमान सेवक एवं सैनिक का सुंदर सम्मिश्रण हैं ! हनुमान अर्थात शक्ति एवं भक्ति का संगम !
४. अविरत सतर्कता एवं अखंड साधना : युद्ध के जारी रहते हुए भी हनुमान जी कुछ समय निकालकर ध्यानस्थ बैठ जाते थे; परंतु उस समय भी वे सतर्क रहते थे । उनकी पूंछ सदा गदा पर रहती ।
५. बुद्धिमान : व्याकरणसूत्र, सूत्रवृत्ति, भाष्य, वार्तिक एवं संग्रह में हनुमान जी की बराबरी करनेवाला कोई नहीं था ।(श्रीवाल्मीकिरामायण, उत्तरकान्ड, सर्ग ३६, श्‍लोक ४४-४६) हनुमान को ग्यारहवां व्याकरणकार मानते हैं ।
६. मनोविज्ञान में निपुण एवं राजनीति में कुशल हनुमान जी : अनेक प्रसंगों में सुग्रीव इत्यादि वानर ही नहीं, राम भी हनुमान जी से परामर्श करते थे । जब विभीषण रावण को छोडकर राम की शरण आया, तो अन्य सेनानियों का मत था कि उसे अपने पक्ष में न लिया जाए । परंतु, हनुमान जी की बात मानकर राम ने उसे अपने पक्ष में लिया । लंका में प्रथम भेंट में ही सीता के मन में अपने प्रति विश्‍वास उत्पन्न करना, शत्रुपक्ष के पराभव के लिए लंकादहन करना, राम के आगमन की सूचना भरत को देने के लिए उन्हीं को अयोध्या भेजना,इन सभी प्रसंगों में हनुमान की बुद्धिमत्ता एवं मनोविज्ञान में निपुणता दिखाई देती है । उन्होंने लंकादहन कर रावण की प्रजा का, रावण के सामर्थ्य पर से विश्‍वास डिगा दिया था ।
७. जितेंद्रिय
सीता को ढूंढने जब हनुमान रावण के अंत:पुर में पहुंचे, तब उनकी जो मनोदशा थी, वह उनके उच्च चरित्र का सूचक है । इस संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं – सर्व रावण पत्नियों को निश्‍चिंत लेटे हुए मैंने देखा,परंतु, मेरे मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ ।(श्रीवाल्मीकिरामायण, सुंदरकांड, सर्ग ११, श्‍लोक ४२, ४३) अनेक संतों ने ऐसे जितेंद्रिय हनुमान को पूज्य मानकर, उनका आदर्श समाज के सामने रखा । इंद्रियजित होनेसे हनुमान जी इंद्रजित को भी पराजित कर सके ।
८. साहित्य, तत्त्वज्ञान एवं वक्तृत्वकला में प्रवीण : रावण के दरबार में हनुमान द्वारा किया गया भाषण वक्तृत्व कला का उत्कृष्ट नमूना है ।
९. संगीत शास्त्र का प्रवर्तक
हनुमान को संगीत शास्त्र का एक प्रमुख प्रवर्तक माना गया है । संभवत: इसका कारण है उनके एवं रुद्र के बीच का संबंध । उन्हें रुद्र का अवतार मानते हैं । हनुमान जी शिव के अवतार थे । राम की उपासना से उनमें विष्णुतत्त्व बढ गया । शिव के डमरू से नाद और नाद से संगीत उत्पन्न हुआ; इसलिए शिव को संगीत का जनक कहा जाता है । हनुमान की जन्मजात गायन प्रतिभा के कारण समर्थ रामदासस्वामी ने उन्हें संगीतज्ञानमहंता की उपाधि दी ।
१०. भक्तों की मनौति पूर्ण करनेवाले : हनुमान जी को मनौति पूर्ण करनेवाले देवता मानते हैं, इसलिए व्रत अथवा मनौति माननेवाले अनेक स्त्री-पुरुष मूर्ति की श्रद्धापूर्वक निर्धारित प्रदक्षिणा करते हैं । जिनके विवाह में बाधा है, ऐसी कुमारिकाओं को ब्रह्मचारी हनुमानजी की उपासना करने के लिए कहा जाता है, यह कुछ लोगोंको आश्‍चर्यजनक लगता है । कुमारिका के मन में इच्छा होती है कि बलवान पुरुष पति के रूप में मिले, इसलिए वह हनुमानजी की उपासना करती हैं, यह अनुचित तर्क भी कुछ लोग देते हैं । परंतु उसके कारण आगे दिए अनुसार हैं ।
१. लगभग ३०% व्यक्तियों का विवाह भूतबाधा, जादू-टोना इत्यादि अनिष्ट शक्तियों के प्रभाव के कारण रुका रहता है । हनुमान की उपासनासे ये कष्ट और विवाह की बाधाएं दूर होती हैं । (१०%व्यक्तियों के विवाह, भावी वधू अथवा वर के एक-दूसरे से अनुचित अपेक्षाओं के कारण नहीं हो पाते । अपेक्षाएं कम करने पर विवाह हो जाता है । ५०% व्यक्तियों का विवाह प्रारब्ध के कारण नहीं हो पाता । प्रारब्ध मंद अथवा मध्यम हो, तो कुलदेवता की उपासना से प्रारब्धजनित बाधाएं नष्ट होती हैं एवं विवाह भी हो जाता है । प्रारब्ध तीव्र हो, तो केवल किसी संत की कृपा से विवाह हो सकता है । शेष १०% व्यक्तियों का विवाह अन्य आध्यात्मिक कारणों से नहीं हो पाता । ऐसी परिस्थिति में, कारण का पता कर उपाय करने पडते हैं । -संकलनकर्ता)
२. अत्युच्च स्तरके देवताओं में ब्रह्मचारी अथवा विवाहित, ऐसा भेद नहीं होता । सभी का जन्म ईश्‍वर के संकल्प से ही होता है । अर्थात उनकी उत्पत्ति योनी से नहीं होती । इसलिए उनमें स्त्री अथवा पुरुष जैसा भेदभाव नहीं रहता । मनुष्य ही यह भेद अपनी कल्पना से निर्माण करता है । स्त्रीवाचक देवता ईश्‍वरकी शक्ति होती हैं ।
११. चिरंजीवी : अपने विभिन्न अवतारों में प्रभु श्रीराम तो वही रहते हैं, परंतु प्रत्येक अवतार में हनुमान का स्थान कोई और ले लेता है । हनुमान सप्तचिरंजीवों में से एक हैं, फिर भी चार युगों के अंत में ये सप्तचिरंजीव मोक्ष को प्राप्त होते हैं व इनका स्थान सात(आध्यात्मिक दृष्टि से) अति उन्नत व्यक्ति ले लेते हैं ।
संकलक : श्री सुरेश मुंजाल
संपर्क क्रमांक : 9811414247

 

(संदर्भ : सनातन का लघुग्रंथ : हनुमान)
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