बंगाल में राजनैतिक पार्टीयो के सह पर आम जनता के साथ दूर-व्यवहार करने से बाज नही आ रहे क्लब के लोग

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बंगाल मे दादागिरी करने का प्रचलन वर्षो पुराना है।जिस प्रथा को उसके अनुयायी कायम किये है,इसके लिए वो किसी हद तक जाने मे रत्ती भर वक्त जाया नही जाने देते। हाल ही में बीते बहुप्रचलीत त्यौहार कम उत्सव दुर्गापुजा में मेरे एक मित्र के साथ क्लब के लोगो ने उनसे चन्दा लेने पर बहस कर ली थी, मामला काफी बढ़ गया था। उन्होने हमसे इस विषय पर सलाह भी ली वे काफी डरे डरे से लग रहे थे। मैने उनसे पुछा क्या बात है , तो वे कहने लगे क्लब वालो के मन माफिक चन्दा न देने पर वे लोग अरदब देकर गये है। घर मे परिवार रहता है बच्चे है ये लोग कुछ गलत बर्ताव न करे। वे कहने लगे मै एक छोटी साडी की दुकान मे काम करता हूं।तनख्वाह के रूप मे ज्यादा नही मिलता उसी मे संसार चलाना होता है। मै धर्म के काम के लिए ना नही बोल रहा पर हर महिने कुछ ना कुछ को लेकर मनमानी चन्दा काटना कहा का नियम है। इन सबके बीच वे डर के मारे परिवार के साथ ये लोग अभद्र व्यवहार न करे उन्होने मुहमागां चन्दा क्लब वालो को दे दिया। आज मै साप्ताहीक अवकाश के चलते घर पर ही था की शाम को लगभग आठ बज रहा था,तब तक डोर बेल बजी मै गेट पर गया तो पता चला की काली पुजा होनी है क्लब वाले चन्दा लेने आये है । मैने पुछा भाई साहब कितना देना है, वे लोग बोले पर्ची मे जितना लिखा है। मुझे मेरे मित्र की बात याद आई मैने कहा इतना तो मै नही दूंगा वे बोले देना होगा। बहरहाल इनके मसुबे हमे भी ठीक नही लगे मैने सोचा की देके हटाओ मै उन्हे उनके मन माफिक चन्दा दिया वे शेखी बघारते हुए चले गये पर एक पत्रकार होने के नाते मेरा मन बेचैन हुये जा रहा था। मैने निर्णय लिया की इस बिषय की जानकारी सत्तासीन राजनेता लोगो के साथ साथ आम जन मानस तक पहुचाना मेरा फर्ज है।जिस वजह यह लेख लिखा। मेरा एक सवाल आप से है क्या यह सही है? क्या भाव के भूखे भगवान को ये पाखंडी उनके नाम पर लोगो को जो परेशान कर रहे है वह ठीक है? आखिर क्या सही है।इस पर आपकी प्रतिक्रिया का हमे इन्तजार रहेगा।

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